हिंदी साहित्य में सोशल मीडिया, नई पीढ़ी और भाषा के बदलते स्वरूप

Authors

  • डॉ. धर्मेन्द्र कुमार सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी, संजय गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय चौकिया, सुलतानपुर Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i3.02

Keywords:

हिंदी साहित्य, सोशल मीडिया, नई पीढ़ी, डिजिटल हिंदी, हिंग्लिश, रोमन हिंदी, भाषा परिवर्तन, डिजिटल साहित्य।

Abstract

इक्कीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में सोशल मीडिया ने संचार, अभिव्यक्ति और साहित्य-सृजन की परंपरागत संरचना में व्यापक परिवर्तन किया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स, व्हाट्सऐप, ब्लॉग, पॉडकास्ट तथा अन्य डिजिटल मंचों ने न केवल सूचनाओं के प्रसार की गति बढ़ाई है, बल्कि भाषा और साहित्य के उपयोग, निर्माण, प्रकाशन तथा ग्रहण की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया है। हिंदी साहित्य के संदर्भ में यह परिवर्तन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डिजिटल माध्यमों ने ऐसे विशाल पाठक और लेखक समुदाय को अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान किया है, जो पारंपरिक पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन संस्थानों तक सहज रूप से नहीं पहुँच पाता था। नई पीढ़ी ने सोशल मीडिया को केवल संवाद के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि कविता, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य, पुस्तक-समीक्षा, कहानी-वाचन, साहित्यिक वीडियो और रचनात्मक प्रयोगों के मंच के रूप में अपनाया है। इसके साथ ही हिंदी भाषा के स्वरूप में भी परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। हिंदी-अंग्रेज़ी का मिश्रित प्रयोग, जिसे सामान्यतः ‘हिंग्लिश’ कहा जाता है, रोमन लिपि में हिंदी लिखना, संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग, इमोजी, हैशटैग, मीम-संस्कृति तथा बोलचाल और स्थानीय भाषायी रूपों की बढ़ती उपस्थिति डिजिटल हिंदी की प्रमुख विशेषताएँ बन गई हैं।

प्रस्तुत शोध-लेख सोशल मीडिया, नई पीढ़ी और हिंदी भाषा-साहित्य के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण करते हुए इस निष्कर्ष तक पहुँचता है कि डिजिटल माध्यम हिंदी के लिए संकट मात्र नहीं, बल्कि उसके विस्तार और पुनर्संरचना का महत्त्वपूर्ण अवसर भी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीकी सहजता और भाषायी स्वतंत्रता के साथ साहित्यिक गुणवत्ता, आलोचनात्मक विवेक और भाषायी उत्तरदायित्व को भी बनाए रखा जाए।

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Published

2026-07-25

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How to Cite

हिंदी साहित्य में सोशल मीडिया, नई पीढ़ी और भाषा के बदलते स्वरूप. (2026). THE PARADIGM CHRONICLE JOURNAL OF ACADEMIC INQUIRY & CRITICAL THOUGHT, 1(3), 11-20. https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i3.02