कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में साइबर सुरक्षा
DOI:
https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i4.04Keywords:
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, जनरेटिव AI, साइबर अपराध, फिशिंग, डीपफेक, डेटा सुरक्षा, मशीन लर्निंग, साइबर जोखिम, डिजिटल भारत।Abstract
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, उद्योग और संचार व्यवस्था में तीव्र परिवर्तन लाने वाली प्रमुख प्रौद्योगिकी के रूप में उभरी है। मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण, जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वचालित निर्णय प्रणालियों के विकास ने डिजिटल सेवाओं को अधिक तेज, सक्षम और उपयोगकर्ता-केंद्रित बनाया है। किंतु इसी परिवर्तन के समानांतर साइबर सुरक्षा की प्रकृति भी जटिल हो गई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल साइबर सुरक्षा का उपकरण नहीं है, बल्कि साइबर अपराधियों द्वारा उपयोग किया जाने वाला शक्तिशाली माध्यम भी बन चुकी है। AI की सहायता से अत्यंत विश्वसनीय फिशिंग संदेश, डीपफेक वीडियो, नकली आवाज, स्वचालित मालवेयर, पहचान की चोरी तथा बड़े पैमाने पर सोशल इंजीनियरिंग अभियान तैयार किए जा सकते हैं। दूसरी ओर, AI आधारित सुरक्षा प्रणालियाँ विशाल मात्रा में नेटवर्क डेटा का विश्लेषण कर असामान्य गतिविधियों की पहचान, खतरे का पूर्वानुमान, मालवेयर वर्गीकरण और स्वचालित घटना-प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
प्रस्तुत शोध आलेख कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा के अंतर्संबंध का विश्लेषण करता है तथा AI-आधारित साइबर खतरों, AI-सक्षम सुरक्षा उपायों, जनरेटिव AI की जोखिमपूर्ण प्रकृति, भारतीय परिप्रेक्ष्य, डेटा संरक्षण, नीति-निर्माण और भविष्य की सुरक्षा रणनीतियों पर विचार करता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को साइबर सुरक्षा के लिए पूर्णतः खतरा अथवा पूर्णतः समाधान मानना उचित नहीं है। इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके विकास, प्रयोग और नियंत्रण के लिए किस प्रकार की सुरक्षित, उत्तरदायी और मानव-केंद्रित व्यवस्था स्थापित की जाती है।