समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में वृद्ध-विमर्श और पारिवारिक संरचना
DOI:
https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i4.07Keywords:
वृद्ध विमर्श, परिवार, अकेलापन, उपभोक्तावाद, हिंदी कथा-साहित्य।Abstract
समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में वृद्ध-विमर्श, सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक विघटन और बदलते मानवीय संबंधों को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। भारतीय समाज में वृद्ध व्यक्ति लंबे समय तक परिवार के अनुभव, परंपरा, संस्कार और निर्णय-प्रक्रिया के केंद्र में रहा है किंतु नगरीकरण, औद्योगीकरण, वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद, रोजगारगत गतिशीलता तथा संयुक्त परिवार के विघटन ने उसकी पारंपरिक भूमिका को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप वृद्धावस्था केवल जैविक जीवन-चक्र की अवस्था न रहकर सामाजिक असुरक्षा, अकेलेपन, उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता, पीढ़ी-अंतराल और आत्मसम्मान के संकट से जुड़ा प्रश्न बन गई है।¹ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य ने इस परिवर्तन को संवेदनात्मक और यथार्थपरक ढंग से अभिव्यक्त किया है। प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी’ से लेकर उषा प्रियंवदा की ‘वापसी’, भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’, उदय प्रकाश की ‘छप्पन तोले का करधन’ तथा इक्कीसवीं सदी के विभिन्न कथा-लेखकों की रचनाओं तक वृद्ध जीवन के अनेक रूप दिखाई देते हैं।² प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में वृद्ध विमर्श के स्वरूप, बदलती पारिवारिक संरचना के साथ उसके संबंध, वृद्ध पात्रों की मनोवैज्ञानिक स्थिति तथा साहित्य द्वारा निर्मित प्रतिरोध और मानवीय चेतना का विश्लेषण करना है।