राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में समावेशी एवं दिव्यांग शिक्षा: नीतिगत प्रावधानों, कार्यान्वयन तंत्र एवं चुनौतियों का आलोचनात्मक दस्तावेजीय विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i4.09Keywords:
समावेशी शिक्षा,दिव्यांग शिक्षा NEP-2020; दस्तावेजी विश्लेषण नीति-से-व्यवहार अंतराल); अंतर-नीतिगत संरेखण सहायक तकनीक.Abstract
समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) और दिव्यांग शिक्षा (Disability Education) आज वैश्विक तथा भारतीय शिक्षा-विमर्श के केंद्र में हैं, जहाँ दान-आधारित (charity-based) दृष्टिकोण से अधिकार-आधारित (rights-based) दृष्टिकोण की ओर एक निर्णायक बदलाव देखा गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) इस बदलाव को भारतीय संदर्भ में आगे बढ़ाने का दावा करती है और स्वयं को नि:शक्तजन अधिकार अधिनियम-2016 (RPwD Act 2016), शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 (RTE Act 2009) तथा समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) के अनुरूप प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत अध्ययन की शोध-समस्या यह है कि पूर्व अध्ययनों ने प्रायः NEP-2020 के प्रावधानों का पृथक् वर्णन किया है, किन्तु प्रावधानों, कार्यान्वयन तंत्र (implementation mechanisms), अंतर-नीतिगत संरेखण (inter-policy alignment) तथा नीति-से-व्यवहार अंतराल (policy-to-practice gap) का एकीकृत आलोचनात्मक विश्लेषण अपेक्षाकृत अल्प है। इस अध्ययन का उद्देश्य NEP-2020 में समावेशी एवं दिव्यांग शिक्षा की संकल्पना, प्रमुख प्रावधानों, संस्थागत उत्तरदायित्वों एवं दस्तावेजी रूप से प्रमाणित चुनौतियों का विश्लेषण करना है। पद्धति के रूप में गुणात्मक दस्तावेजी शोध (Qualitative Documentary Research) तथा विषयगत दस्तावेजी विश्लेषण (Thematic Documentary Analysis) को अपनाया गया, जिसमें NEP-2020, RPwD Act 2016, RTE Act 2009 एवं समग्र शिक्षा को प्राथमिक दस्तावेज़ों के रूप में तथा शिक्षा मंत्रालय, NCERT एवं UNESCO के दस्तावेज़ों को सहायक साक्ष्य के रूप में लिया गया। प्रमुख निष्कर्ष दर्शाते हैं कि NEP-2020 समावेशी शिक्षा की एक सुसंगत नीतिगत मंशा प्रस्तुत करती है, किन्तु विशेष शिक्षकों की नियुक्ति, अभिगम्यता (accessibility), सहायक तकनीक (assistive technology) एवं अनुश्रवण (monitoring) के स्तर पर कार्यान्वयन-वास्तुकला में स्पष्ट अंतराल विद्यमान हैं। अध्ययन यह निष्कर्ष देता है कि नीतिगत मंशा और नीतिगत प्रावधान का अस्तित्व स्वयं सफल कार्यान्वयन का प्रमाण नहीं है। इसके निहितार्थ शिक्षक-शिक्षा, संस्थागत क्षमता एवं उत्तरदायित्व-तंत्र के सुदृढ़ीकरण की ओर संकेत करते हैं।