सावित्रीबाई फुले: भारत में सामाजिक पुनर्जागरण और स्त्री-शिक्षा का इतिहास

Authors

  • डॉ. शिवम वर्मा असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, हण्डिया पी०जी० कॉलेज, हण्डिया, प्रयागराज (उo प्रo)- 221503 Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i5.12

Keywords:

सांस्कृतिक पुनर्जागरण, औपनिवेशिक उभार, सामाजिक सुधार आंदोलनों, सावित्रीबाई फुले ।

Abstract

19वीं शताब्दी का भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण, औपनिवेशिक उभार और सामाजिक सुधार आंदोलनों का एक अत्यंत संवेदनशील तथा संक्रांतिकाल था। इस ऐतिहासिक कालखंड में जहाँ एक ओर औपनिवेशिक सत्ता और पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार हो रहा था, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज सदियों पुरानी जाति-प्रथा, छुआछूत, बाल-विवाह, सती-प्रथा, अनमेल विवाह, वैधव्य की विभीषिका (केशवपन/मुंडन) और स्त्री-अशिक्षा जैसी प्रतिगामी रूढ़ियों से गहराई से जकड़ा हुआ था। ऐसे दौर में महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले तथा उनकी क्रांतिधर्मी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक परिवर्तन की एक अभूतपूर्व क्रांति का सूत्रपात किया । प्रस्तुत शोध पत्र सावित्रीबाई फुले (1831–1897) के जीवन, उनके सामाजिक संघर्षों, संस्थागत शैक्षणिक अवदानों और विचार-दर्शन का एक गहन ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है ।

               यह शोध पत्र इस बात का सूक्ष्म विश्लेषण करता है कि किस प्रकार सावित्रीबाई फुले ने 01 जनवरी 1848 को पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोलकर न केवल नारी-शिक्षा की मजबूत नींव रखी, बल्कि 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' (1853), 'सत्य शोधक समाज' (1873) और 'महिला सेवा मंडल' (1892) के माध्यम से शोषितों, अछूतों, बेसहारा विधवाओं और दलितों के मानवीय अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया । इसके अतिरिक्त, उनकी काव्य कृतियों में व्यक्त 'अज्ञान' के विनाश और 'सर्वजन सुखाय' की दार्शनिक चेतना तथा आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी ऐतिहासिक व समकालीन प्रासंगिकता का गहन विश्लेषणात्मक मूल्यांकन करना इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य है ।

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Published

2026-09-16

How to Cite

सावित्रीबाई फुले: भारत में सामाजिक पुनर्जागरण और स्त्री-शिक्षा का इतिहास. (2026). THE PARADIGM CHRONICLE JOURNAL OF ACADEMIC INQUIRY & CRITICAL THOUGHT, 1(5), 96-102. https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i5.12