हिंदी कहानी में आदिवासी विमर्श का विकास
DOI:
https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i5.24Keywords:
आदिवासी विमर्श, हिंदी कहानी, अस्मिता, जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, आदिवासी स्त्री, स्वानुभूति, प्रतिरोध, संस्कृति।Abstract
हिंदी साहित्य में आदिवासी विमर्श का विकास भारतीय समाज के उन समुदायों की अस्मिता, स्मृति, संस्कृति और संघर्ष को साहित्यिक केंद्र में लाने की प्रक्रिया है जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में प्रायः बाहरी दृष्टि से देखा गया। हिंदी कहानी में यह विकास एकरेखीय नहीं रहा। आरंभिक चरण में आदिवासी जीवन का चित्रण रोमानी, लोक-रंजक अथवा ‘वनवासी’ जीवन की विलक्षणता के रूप में दिखाई देता है; धीरे-धीरे शोषण, वन-अधिकार, भूमि-अधिग्रहण, विस्थापन, श्रम, स्त्री-अनुभव और राज्य-सत्ता के प्रश्न कथ्य के केंद्र में आए। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और विशेषतः 1990 के बाद अस्मितामूलक विमर्शों के उभार ने आदिवासी कथा-लेखन को नई वैचारिक ऊर्जा दी। इसी के साथ आदिवासी समुदायों से आने वाले लेखकों की स्वानुभूति, भाषिक स्मृति और सांस्कृतिक दृष्टि ने प्रतिनिधित्व के प्रश्न को अधिक जटिल और प्रामाणिक बनाया। प्रस्तुत शोध-आलेख हिंदी कहानी में आदिवासी विमर्श की ऐतिहासिक यात्रा, प्रमुख प्रवृत्तियों, प्रतिनिधि रचनाकारों तथा बदलते सौंदर्यबोध का विश्लेषण करता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि समकालीन आदिवासी कहानी करुणा या ‘विषय’ भर नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन, सामुदायिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक अधिकार, लैंगिक प्रश्न, आधुनिक विकास की आलोचना और आत्मप्रतिनिधित्व से निर्मित एक स्वतंत्र वैचारिक-साहित्यिक क्षेत्र है।