भारतीय ज्ञान परम्परा: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • डॉ. अमित कुमार सहायक आचार्य, शिक्षाशास्त्र विभाग, मान्यवर कांशीराम राजकीय महाविद्यालय, फर्रुखाबाद उ0प्र0 Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i5.25

Keywords:

भारतीय ज्ञान परंपरा, वेद, उपनिषद,बौद्धिक विरासत ।

Abstract

भद्रायां सुमतौ यतेम | ऋग्वेद (६।१।१०)

Let us strive for the wisdom that leads to the welfare of all

आईये हम उस ज्ञान के लिये प्रयास करें जो सभी को कल्याण की ओर ले जाये..

वेदों व उपनिषदों के मंत्र रचयिता ज्ञानी ऋषियों ने अविद्या और अज्ञानता रूपी अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करने के लिये विश्वात्मा से प्रार्थना करते हैं- "तमसो मा ज्योतिर्गमय"

अर्थात तम से प्रकाश की ओर अग्रसर होना। तम जिसे हम कभी अंधकार के रूप में, कभी अज्ञानता के रूप में, कभी बुराई के रूप में तो कभी अन्य किसी नकारात्मकता के रूप में देखते हैं तथा इस स्थिति से निकलने के लिये प्रयासरत रहते हैं।भारतीय ज्ञान परंपरा इस तम, अंधकार, बुराई, अज्ञानता या नकारात्मकता से प्राणी मात्र को मुक्त करने तथा ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करने हेतु सशक्त माध्यम है।  भारतीय महाद्वीप सहस्राब्दियों से विविध संस्कृतियों, परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों का मिश्रण रहा है तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ सांस्कृतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक परिदृश्य का अभिन्न अंग रही हैं ।  प्राचीन वैदिक ग्रंथों से लेकर वैज्ञानिक खोजों के आधुनिक युग तक, भारत ने एक समृद्ध और बहुमुखी बौद्धिक विरासत को प्रोत्साहित  किया है जो वैश्विक विचारों को समग्रता में प्रभावित करती रहती है। प्रस्तुत  विश्लेषणात्मक अध्ययन में, हम भारतीय ज्ञान प्रणाली के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे साथ ही इसके ऐतिहासिक विकास, दार्शनिक आधार और समकालीन प्रासंगिकता की स्थापना करने का भी प्रयास करेंगे।

Downloads

Published

2026-09-27

How to Cite

भारतीय ज्ञान परम्परा: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. (2026). THE PARADIGM CHRONICLE JOURNAL OF ACADEMIC INQUIRY & CRITICAL THOUGHT, 1(5), 228-234. https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i5.25