संवैधानिक नैतिकता और भारतीय राष्ट्रवाद: डॉ. भीमराव अंबेडकर के राजनीतिक दर्शन के संदर्भ में
DOI:
https://doi.org/10.64880/pcjaict.v1i2.03Keywords:
डॉ. बी. आर. अंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता, भारतीय राष्ट्रवाद, सामाजिक लोकतंत्र, संवैधानिक राष्ट्रवाद, सामाजिक न्याय, समानता, बंधुत्व।Abstract
डॉ. भीमराव अंबेडकर का राजनीतिक दर्शन भारतीय लोकतंत्र को केवल शासन-पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण सामाजिक जीवन की व्यापक परियोजना के रूप में देखता है। इस परियोजना में संवैधानिक नैतिकता का विशेष स्थान है। अंबेडकर ने 4 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में जॉर्ज ग्रोट की व्याख्या का उल्लेख करते हुए संवैधानिक रूपों के प्रति सम्मान, संवैधानिक अधिकार-सीमाओं के भीतर सत्ता का प्रयोग, खुली अभिव्यक्ति तथा सार्वजनिक अधिकारियों की आलोचना की स्वतंत्रता को संवैधानिक नैतिकता के आवश्यक तत्त्वों के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है; इसे विकसित करना पड़ता है। प्रस्तुत शोध-लेख का उद्देश्य अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा को भारतीय राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के संदर्भ में विश्लेषित करना है। अध्ययन ऐतिहासिक, दार्शनिक और विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है तथा अंबेडकर के मूल लेखन और संविधान सभा के भाषणों को प्राथमिक स्रोत के रूप में ग्रहण करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अंबेडकर के लिए राष्ट्र की लोकतांत्रिक एकता बहुमत की इच्छा मात्र पर आधारित नहीं हो सकती; उसे संविधानसम्मत सत्ता, समान नागरिकता, अल्पसंख्यक अधिकारों, सामाजिक लोकतंत्र और संस्थागत उत्तरदायित्व का आधार चाहिए। इस दृष्टि से संवैधानिक नैतिकता भारतीय राष्ट्रवाद को विधि के शासन, नागरिक गरिमा और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व से जोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण नैतिक-राजनीतिक सिद्धांत है।